Saturday, 20 October 2012

एक छोटा सा किस्सा ....जो बहुत ख़ास बन गया |

  वाओ  यार  खादी  इज़  सो  गुड !



बात कुछ दिनों पहले की है ....बाज़ार में खादी की एक दुकान पर यूँ ही नज़र चली गयी तो सोचा एक बार अन्दर जाकर  कलेक्शन भी देख ही लूं । स्कूल के दिन भी अब बीत चुके है सो यूनिफार्म से तो  छुटकारा मिल ही गया है । लेकिन वहीं दूसरी तरफ कॉलेज प्रशाशन ने भी यह नियम लागू कर दिया है की छात्र "ढंग" के कपड़े पहन कर ही कॉलेज आयें । जैसे ही दुकान के अन्दर गयी तो नज़र वहां टंगे खादी  के कुर्तों पर चली गयी और देखते ही देखते मैंने 4-5 कुरते खरीद लिए । कुर्तों और खासकर खादी का भूत कुछ यूं सर पर चढ़ा की उस महीने की सारी जमा-पूंजी को उसी पर उड़ा दिया  ।

अब शुरू हुआ असली किस्सा , कॉलेज शुरू हो गया और साथ ही कोचिंग भी । हाँ भाई , 12th  तक कोचिंग न करने के बहुत से साइड इफेक्ट्स देखे है इसलिए कॉलेज जाते ही साथ में ही कोचिंग भी ज्वाइन कर लिया ।
पहले दिन तो सब की नज़रे बिना कुछ कहे ही सर्राटे से दौड़ते हुए चली गयी ।

एक हफ्ते बाद कॉलेज कैंपस और कोचिंग कैंपस में बहुत सी लड़कियाँ  कुरते में दिखने लगीं । जी हाँ , ये वही लड़कियाँ  है जिन्होंने कॉलेज में "ड्रेस कोड" लागू करने  की बात पर जमकर हंगामा किया था । थोड़े दिन और बीते फिर कई लड़कियों ने हिम्मत करके पूछ ही लिया "आशना  तेरी कुर्तियाँ बहुत अच्छी लगती है कहाँ से खरीदा है ?" मैंने उन्हें बड़े खुले दिल से बता दिया की मैंने "खादी भंडार" का सहारा लिया है। पहले तो सबको लगा मजाक कर रही हूँ लेकिन जैसे ही उन्होंने फैब्रिक के बारे में जाना सबके ज़ुबान से एकाएक निकल पड़ा 
 "वाओ यार खादी इज़ सो  गुड !"

इसी तरह एक दिन पड़ोस की आंटी जी ने भी मुझे आवाज़ लगायी और बाकियों की तरह ही मेरे कुर्तों के बारे में ही तारीफ की और दूकान का नाम जानना की इच्छा जताई ,और तो और आंटी जी ने तो यह तक कह दिया कि काश! उनकी भी  बेटी ऐसे ही कपड़े पहनती ।
कुछ दिन बाद के तो हालात गज़ब ही हो गए, लड़कियों के साथ साथ लड़के भी कुरते में कॉलेज और कोचिंग आने लगे । जब भी किसी के "खादी वाले कुरते" पर नज़र जाती, सामने वाला शख्स  एक प्यारी से मुस्कान मेरे नाम कर देता । 

जब मैंने ये सारी बातें घर में बताई तो भाई-बहन ने  हमेशा  की तरह मज़ाकिया अंदाज़ में कहा- "सारे खादी भंडारों की चांदी हो गयी तुम्हारे कारण " । मम्मी ने बड़ी ही परिपक्वता से कहा - " चलो इसी बहाने युवाओं  को खादी के बारे में पता तो चला । वरना वो तो इसे आउटडेटिड चीज़ ही समझते है । अच्छा है कम से कम तुमने लोगों को प्रेरित तो किया | "

सचमुच मुझे सबकी बातों ने सोचने पर मजबूर कर दिया , कितना अच्छा  हो अगर सरकार और साथ ही फैशन से जुड़े लोग अगर "खादी " का प्रचार- प्रशार शुरू कर दे ।खादी का निर्माण कितना उत्कृष्ट सिद्ध होगा हमारे देश की आर्थिक स्तिथि के लिए । साथ ही आप सभी को जाते हुए यह भी बता देती हूँ कि बापू का भी यही मानना था कि देश की प्रगति के लिए खादी और उससे जुड़े अन्य चीज़ों का उत्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है ।

Saturday, 25 August 2012

" होना और न होना ....एक ही सिक्के के दो पहलू हैं..."

" किसी का होना सत्य है...किसी का  न होना सत्य है...               होना और न होना ....एक ही सिक्के के दो पहलू हैं..."




'अटल बिहारी वाजपेयी जी'  की ये कविता डी.वी.डी पर सुन रही थी कि तभी मन nostalgic होने लगा और 
मैंने उसे बंद कर दिया । टाइमपास करने के लिए हमेशा की तरह facebook  का सहारा लेना पड़ा और तभी
ध्यान एक फ्रेंड के message पर  गया । दोस्त ने भी यही लिखा था कि  कैसे सब 12th  के बाद एक दुसरे को इग्नोर  कर रहे हैं। सच कहूं  बहुत ख़राब लगा यह मेसेज पढ़के  लेकिन किया भी क्या जा सकता  था सो मैंन भी कुछ inspiring  टाइप का लिख डाला। दोस्त तो खुश हो गया लेकिन मेरा पहले से ही उदास मन और उदास
हो गया ।


मिलना और बिछड़ना तो ज़िन्दगी भर लगा रहता है चाहे वो थोड़े दिनों के लिए हो या हमेशा के लिए, लेकिन यादें हमेशा के लिए ही रह जाती हैं ।और इनके सहारे ज़िन्दगी भी थोड़ी खुशनसीब हो जाती है । लोग हमारे अस्तित्व का अहम हिस्सा हैं और जितना मेरे लिए उनका "होना" महत्व रखता है शायद आपक लिए भी "उनका होना" महत्व रखता होगा ।

क्या हुआ अगर किसी के पास हमारे लिए वक़्त नहीं है .....हम ही उन्हें याद कर लिया करेंगे ....
क्या हुआ अगर दोस्त ने मैं का जवाब न दिया तो ......एक बार उन्हें फिर से मेल कर के हाल चाल पूछ  लेंगे ....
क्या हुआ अगर कोई ख़ास हमसे बिल्कुल अलग हो गया ....हम तो फिर भी उसकी ख़ुशी की ही कामना करेंगे...
क्यों ऐसा ही करेंगे , है की नहीं ? अरे! नहीं क्यों  हम तो ऐसा ही करते है "मन ही मन याद " ।
और अगर कोई हमसे दूर  चला गया हो बहुत दूर .....तब भी  हम तो  ख़ुशी की ही कामना करेंगे, और दिल के उस ख़ास कोने से कभी-कभी याद कर लिया करेंगे ।

मैं तो अपने तहे दिल से हर उस दोस्त,रिश्तेदार और राज़दार  से बस ये कहना चाहती हूँ कि "शुक्रिया की आप मेरे ज़िन्दगी में आये , क्यूंकि शायद आपके न होने से मेरे ज़िन्दगी भी इतनी अच्छी न होती"।
जो चले गए वो हमेशा यादों और फरियादों में रहेंगे , और जो हैं उनसे बस यही गुज़ारिश है कि  काश! आपका साथ हमेशा ऐसे ही बना रहे।

और ये लाइन ख़ासकर  मेरे दोस्त के लिए....... तुम्हारा बहुत-बहुत शुक्रिया क्यूंकि अगर तुम नही होते तो शायद आज ये शब्द यहाँ न होते।मुझे कभी पता न चलता की "वाजपयी" जी की कविता सिर्फ कविता ही नहीं बल्कि जीवन की इतनी बड़ी सच्चाई है ।












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Sunday, 25 September 2011

नए ख्वाबों की बारिश



                      


 भीगी - भीगी सी है ये फिजा ,
या फिर मेरे ख्वाब कुछ नए हैं ,
आसमान से है बूँद बरसते ,
या किसी के दिल से  ख्याल उमड़ रहे हैं |
संगीत है ये कोई नया या फिर ,
अलफ़ाज़ बदल रहे हैं ,
नयी है ये मुस्कुराहट ,
या फिर जीने के अंदाज़ बदल रहे हैं |
ख़ामोशी है ये कौन सी ,
के ज़िन्दगी फुसफुसा के कह रही है ,
मर-मर कर जीना या फिर ,
जी कर मरना सही है |
बरसात तो है ये लेकिन ,
आज ख्वाब बरस रहे हैं ,
लिखी हुई थी जो दास्ताँ ,
उसके किरदार बदल रहे हैं |
इस से पहले की मन बदल जाये  ,
भीगने  दो खुद को,  
कायनात  की करामात  बदल जाये ,
सजने  दो ज़मीन को |
शक्ल तो वही हो लेकिन ,
हो इंसान नया ,
जब ख्वाबों की बारिश से भीगे मेरा ये जहाँ |




Wednesday, 10 August 2011

अवांछित वृत्तांत

अवांछित वृत्तांत





सुलगती है मेरी वेदना ,
आ जाती है जो याद कभी ,
उस  धोखेबाज़ की |
गालियों और उपहति का बदला ,
मेरे ध्येय ने निस्तब्धता और संयम से  लिया |
घोर अनर्थ होता ,
मेरा उस दुर्जन शैतान दुष्ट से लड़ना |
जिसे कभी मित्र समझने की भूल कर डाली थी ,
अफ़सोस तले उस "खुद" को ,
कोसती अंतकरण मेरी |
ऐतबार जो कर लिया था ,
उसकी हर-एक कही बात का ,
बनावटी लगता है अब हर ज़र्रा उसका |
अहानिकर मै कर बैठती हूँ भरोसा ,
न जाने कैसे अजनबियों पर ,
दयालुता का पर्दा ओढ़े शैतान घुमते है यहाँ |
मैत्री का निरर्थक रूप ,
शायद सबों के दिल में जगह 
बनाकर बैठ गया है |
मेरा सिर्फ एक सवाल ......
दोस्ती अब इस जग के लिए क्या है ?
ढोंग, बेईमानी , नफरत या एक सम्बन्ध रिश्तेदारी |
जान कर उसकी सच्चाई ,
ठेस बहुत पहुंचा था मन को ,
लेकिन सच्चे साथियों ने थाम लिया इस जीवन को |
जो न होता कभी यह,
विक्रय मन को ,
न कभी जान पाती मै उस धोखेबाज़ के सच को |
बोझ बनाकर उसकी वृत्तान्त को ,
नही दुःख में रहना मुझे ,
जियूं हर पल हंसी - ख़ुशी चाहे ये दिया जब भी बुझे|
अशिष्ट अभिनय की ही उम्मीद ,
है मुझे उससे ,
परन्तु समंजनीय है मेरा आचरण इस दुविधा के लिए |
नित्य रहेगा वो धोखेबाज़ और उसकी हरकतें ,
नही उदित होंगी मेरे मन में कभी भी नफरतें ,
ज्ञात है उसकी  भड्कैल क्षमा की कोशिशें |
उतार कर फ़ेंक दिया है ,
किसी हेमंत की रात में ओढ़ी  हुई शॉल ,
जिसका कोई आडम्बर नही होता ग्रीष्म में की ही तरह ,
उस धोखेबाज़ की ,
'अवांछित वृत्तान्त ' को |

- आशना सिन्हा 
 

 








Saturday, 23 July 2011

मेरा पहला लेख.... खुद की तलाश .....

                          खुद की तलाश ..... 





हम इंसान  भी न बहुत ही बेफिक्र हैं | हर वक़्त हम किसी न किसी चीज़ या किसी दुसरे इंसान की तलाश ही करते रहते हैं| कभी हमें ख़ुशी चाहिए....कभी शांति...कभी मन को सुकून ....कभी एक दोस्त ...कभी कोई सच्चा प्यार करने वाला.....कभी कोई हरकदम पर साथ देने वाला | और अनजाने में ही सही लेकिन हम हमेशा इस अर्थहीन तलाश में खोये रहना पसंद करते हैं | यह "तलाश" न ही हमारा शौक है और न ही फितरत लेकिन फिर भी यह हमें रोमांचक और साथ ही जरूरी भी लगती है |
इन सभी गैर जरूरी तलाशों के बीच हम एक  सबसे अहम् तलश करना भूल जाते हैं | जी हाँ , हम हमेशा लोगो क बीच खुद को भूल जाते है | आजीवन हम दुसरो के बारे में ज्यादा सोचते है और खुद बारे में कम | लेकिन ऐसा क्यूँ? क्या हमारे जीवन में दुसरो का ज्यादा  महत्त्व है ? क्या हमने यह जन्म दुसरो को खुश रखने के लिए लिया है ? 
ऐसे ही सैकड़ो सवाल हर पल मेरे अभिप्राय में चक्कर काटते रहते हैं |खुद को बेहतर बनाने के  बदले हम इंसान हमेशा अपनी  परिस्थितियों को बेहतर करने को कोशिश करते हैं | परन्तु , कितना अच्छा होता अगर हम यह समझ जाते कि "जब हम अच्छे होंगे तभी हमारी  परिस्थितियां भी "| इसीलिए हर व्यक्ति को अपने जीवनकाल में  खुद की तलाश करनी चाहिए न की उन चीज़ों की जो सिर्फ दूर से ही लुभावनी लगती हैं |
लोग कहते हैं हमारा मन इस ब्रह्माण्ड से कई जादा बड़ा और खूबसूरत है |
और मैं इस बात पर पूरा विश्वास रखती हूँ | अनगिनत भावनाएं , रहस्य , सच्चाई और यादें सब हमारे अन्दर तो पहले सी ही मौजूद है तो फिर  बाहर  की इस खोकली दुनिया में क्या ढूँढना | और अगर कुछ खोजना ही है तो फिर अपनों के दिल में बसने वाले उन दुआओं और प्यार को खोजो जो सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे लिए बने |
जीवन के इस अनमोल "तलाश" को यूँ व्यर्थ में मत जाने दो | आखिर में जब हमें अगर कुछ याद रहेगा तो वो होगी हमारे इस आजीवन की गयी तलाश और तलाश में खोजा गया खज़ाना अर्थात हमारा पवित्र हृदय | आप सब भी अपनी तलाश जारी रखिये और प्रयास कीजिये उन सभी खुशियों ,शांति के दो पल और एक सच्चे मित्र को खुद के भीतर खोजने की|

फिर मिलेंगे अगली बार एक बेहतर आप और एक बेहतर मैं इसी जगह ...तब तक के लिए शुक्रिया |


Sunday, 10 July 2011

बदनाम गलियाँ



बदनाम गलियाँ




अजनबी तनहाइयाँ आज फिर ले आई उसे ,
बदनाम गलियों के दरवाज़े पर | 
नशे में धुत आज फिर उसकी आत्मा ,
कदम उसके फिर गये बदनाम गलियों पर ठहर |

शहर के हो-हल्ले से दूर हैं इसके रास्ते,
आते रहते हैं प्यार के प्रेमी यहाँ ,
अपने "पराये शागिर्द" की तलाश में |

लज्जा - रहित नज़रे उसकी आज हैं ,
फिर किसी के सीने से लग जाने की आस में |
इन बदनाम गलियों में बिकता असली प्यार है ,
आती हैं हस्तियाँ भी कभी -कभी यहाँ शांति की आस में |

मोगरे के फूलों सी महकती यह गलियाँ ,
चिड़ियाँ जैसी चहकती यह गलियाँ ,
दरिंदगी के बीच ज़िन्दगी से मिलवाती यह बदनाम गलियाँ |

कुछ पल सुकून देती उसे यह चादर की सिलवटें ,
दर्द की छाँव से भी मुक्त कर देती |
याद कर पुरानी बातें बदलता रहता वो करवटें ,
बदनाम गलियाँ वो सरे ग़म हंस कर अपनी झोली में ले लेती हैं | 

दिखावों से मुह मोड़ती यह गलियाँ ,
कभी न खिलने वाली फूलों की कलियाँ ,
सबको अपनी पहचान दिलाने वाली यह बदनाम गलियाँ |

गलत अंदाज़ नज़रों से परखा जाता इसे ,
जज्बातों से लेकिन कोई खेलता नही यहाँ |
बेदाग़ दामन लेकर घुमने वाले ,
अंतर्मन साफ़ करने खटखटाते हैं यहाँ |

पैसों से ही सही पर सच्ची खुशियाँ देती यह गलियाँ ,
गम से कभी न रूबरू कराती यह गलियाँ ,
टूटे दिल को सुन्दर मूरत बनाती यह बदनाम गलियाँ |

उसके भी गमगीन मन को कर दिया फिर खुशनुमा ,
शुक्रिया जैसा कोई अलफ़ाज़ नही उनके लिए यहाँ |
अपने कुरूप जग का एक सुन्दर हिस्सा है यह दुनिया ,
कितना शीतल कितना स्थिर है यहाँ का समा |
 
माना एक गंदे सच का परिचय हैं यह गलियाँ ,
दुनिया और हम इंसानों से कई गुणा पवित्र हैं यह गलियाँ ,
जिसको जग ने ठुकराया उसे इसने गले से लगाया ,
सच्ची मित्र भी हैं यह गलियाँ |

सुबह के उजाले के साथ रात की तरह वो  भी वापस लौट गया ,
पैसो  की दुनिया में उसने पैसो से ही  सच्चा प्यार पाया |
फर्क हम में और उनमे कैसे हो सकता है इतना ,
इंसानों के शरीर में समाया है खुदा का काया  |

ज़ख्मों को पट्टी करती यह गलियाँ ,
हर दुःख हर शरीर को आँचल से ढक देती यह गलियाँ , 
घिनौनी मगर इंसान को खिलौना नही समझती यह बदनाम गलियाँ |

 



 
 




 

Wednesday, 15 June 2011

मै मसखरा


मै मसखरा 






चले गए सब हँस कर मुझ पर ,
पर मै अन्दर ही अन्दर रोता रहा |
जाग गई  ये दुनिया लेकिन,
मै अबतक यूँ ही सोता रहा |

हँसना तो सीख लिया खुद पर ,
पर सीखी नही दुनियादारी |
जो जान लिया होता दुनिया से मैंने लड़ना  ,
न होता मै आज इस चौराहे पर खड़ा |

हाँ , मै पगला , मै बेवकूफ मसखरा |
 
कोई न अपना मुझे इस जग से मिला ,
खून के  रिश्तों से जो मैंने किया गिला |
धोखा दे कर दिल को सब ने सैकड़ो बार तोड़ा,
हर बार वो शीशा मेरे अपनों ने ही जोड़ा |

ढक लिया यह चेहरा अपना ,
रंगों की आड़ लेकर |
न जाना मैंने कितनी खुशियाँ  ब्याज में मिलती हैं ,
थोड़ा  उधार देकर |

हाँ , मै नासमझ , मै नादान मसखरा |

बीत चूका था जीवन आधा,
जब जाना लोगों का सच |
जी लूं खुद अपने लिए भी ,
जो चंद लम्हे बच गये है अब |

कितने करतब सीखे मैंने ,
और सीखी कई कलाकारी |
पर परखना भूल गया मै ,
खुद से मेरी इमानदारी |

हाँ , मै अड़ियल , मै जिद्दी मसखरा |

सच - झूठ न जाना कभी ,
 न जाना वादों का खेल |
हरदम सब ने यही चढ़ाया ,
न जग में मेरा कोई मेल |

जीना जो सीखा गम में ,
सीख लिया जीना कम में |
लेकिन हिम्मत अभी भी बाकी  है जेहन में ,
क्योंकि साथ है उसका मेरा हर नमन में |

हाँ , मै मानुषिक , मै निष्कलंक मसखरा |

देखूं जो मै दुनिया इन  नजरो से ,
जीवन की खुशबू है अपनों के  गजरे से |
तरसूं न अब मै खुशियों के  लिए,
सबक जो  मैंने  अपनी हर गलती से लिए |

बोध हुआ जब अपने अचेत मन से ,
मेरी उंचाई अब होगी परे गगन से |
सब का मै और मेरे सब ,
 नही गम मै झेलूँगा अब |

हाँ , मै सुपरिचित ज्ञानी , मै अत्युत्तम मसखरा |