Saturday, 23 July 2011

मेरा पहला लेख....

                          खुद की तलाश ..... 



हम इंसान  भी न बहुत ही बेफिक्र हैं | हर वक़्त हम किसी न किसी चीज़ या किसी दुसरे इंसान की तलाश ही करते रहते हैं| कभी हमें ख़ुशी चाहिए....कभी शांति...कभी मन को सुकून ....कभी एक दोस्त ...कभी कोई सच्चा प्यार करने वाला.....कभी कोई हरकदम पर साथ देने वाला | और अनजाने में ही सही लेकिन हम हमेशा इस अर्थहीन तलाश में खोये रहना पसंद करते हैं | यह "तलाश" न ही हमारा शौक है और न ही फितरत लेकिन फिर भी यह हमें रोमांचक और साथ ही जरूरी भी लगती है |
इन सभी गैर जरूरी तलाशों के बीच हम एक  सबसे अहम् तलश करना भूल जाते हैं | जी हाँ , हम हमेशा लोगो क बीच खुद को भूल जाते है | आजीवन हम दुसरो के बारे में ज्यादा सोचते है और खुद बारे में कम | लेकिन ऐसा क्यूँ? क्या हमारे जीवन में दुसरो का ज्यादा  महत्त्व है ? क्या हमने यह जन्म दुसरो को खुश रखने के लिए लिया है ? 
ऐसे ही सैकड़ो सवाल हर पल मेरे अभिप्राय में चक्कर काटते रहते हैं |खुद को बेहतर बनाने के  बदले हम इंसान हमेशा अपनी  परिस्थितियों को बेहतर करने को कोशिश करते हैं | परन्तु , कितना अच्छा होता अगर हम यह समझ जाते कि "जब हम अच्छे होंगे तभी हमारी  परिस्थितियां भी "| इसीलिए हर व्यक्ति को अपने जीवनकाल में  खुद की तलाश करनी चाहिए न की उन चीज़ों की जो सिर्फ दूर से ही लुभावनी लगती हैं |
लोग कहते हैं हमारा मन इस ब्रह्माण्ड से कई जादा बड़ा और खूबसूरत है |
और मैं इस बात पर पूरा विश्वास रखती हूँ | अनगिनत भावनाएं , रहस्य , सच्चाई और यादें सब हमारे अन्दर तो पहले सी ही मौजूद है तो फिर  बाहर  की इस खोकली दुनिया में क्या ढूँढना | और अगर कुछ खोजना ही है तो फिर अपनों के दिल में बसने वाले उन दुआओं और प्यार को खोजो जो सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे लिए बने |
जीवन के इस अनमोल "तलाश" को यूँ व्यर्थ में मत जाने दो | आखिर में जब हमें अगर कुछ याद रहेगा तो वो होगी हमारे इस आजीवन की गयी तलाश और तलाश में खोजा गया खज़ाना अर्थात हमारा पवित्र हृदय | आप सब भी अपनी तलाश जारी रखिये और प्रयास कीजिये उन सभी खुशियों ,शांति के दो पल और एक सच्चे मित्र को खुद के भीतर खोजने की|

फिर मिलेंगे अगली बार एक बेहतर आप और एक बेहतर मैं इसी जगह ...तब तक के लिए शुक्रिया |


Sunday, 10 July 2011



बदनाम गलियाँ.....

अजनबी तनहाइयाँ आज फिर ले आई उसे ,
बदनाम गलियों के दरवाज़े पर | 
नशे में धुत आज फिर उसकी आत्मा ,
कदम उसके फिर गये बदनाम गलियों पर ठहर |

शहर के हो-हल्ले से दूर हैं इसके रास्ते,
आते रहते हैं प्यार के प्रेमी यहाँ ,
अपने "पराये शागिर्द" की तलाश में |

लज्जा - रहित नज़रे उसकी आज हैं ,
फिर किसी के सीने से लग जाने की आस में |
इन बदनाम गलियों में बिकता असली प्यार है ,
आती हैं हस्तियाँ भी कभी -कभी यहाँ शांति की आस में |

मोगरे के फूलों सी महकती यह गलियाँ ,
चिड़ियाँ जैसी चहकती यह गलियाँ ,
दरिंदगी के बीच ज़िन्दगी से मिलवाती यह बदनाम गलियाँ |

कुछ पल सुकून देती उसे यह चादर की सिलवटें ,
दर्द की छाँव से भी मुक्त कर देती |
याद कर पुरानी बातें बदलता रहता वो करवटें ,
बदनाम गलियाँ वो सरे ग़म हंस कर अपनी झोली में ले लेती हैं | 

दिखावों से मुह मोड़ती यह गलियाँ ,
कभी न खिलने वाली फूलों की कलियाँ ,
सबको अपनी पहचान दिलाने वाली यह बदनाम गलियाँ |

गलत अंदाज़ नज़रों से परखा जाता इसे ,
जज्बातों से लेकिन कोई खेलता नही यहाँ |
बेदाग़ दामन लेकर घुमने वाले ,
अंतर्मन साफ़ करने खटखटाते हैं यहाँ |

पैसों से ही सही पर सच्ची खुशियाँ देती यह गलियाँ ,
गम से कभी न रूबरू कराती यह गलियाँ ,
टूटे दिल को सुन्दर मूरत बनाती यह बदनाम गलियाँ |

उसके भी गमगीन मन को कर दिया फिर खुशनुमा ,
शुक्रिया जैसा कोई अलफ़ाज़ नही उनके लिए यहाँ |
अपने कुरूप जग का एक सुन्दर हिस्सा है यह दुनिया ,
कितना शीतल कितना स्थिर है यहाँ का समा |
 
माना एक गंदे सच का परिचय हैं यह गलियाँ ,
दुनिया और हम इंसानों से कई गुणा पवित्र हैं यह गलियाँ ,
जिसको जग ने ठुकराया उसे इसने गले से लगाया ,
सच्ची मित्र भी हैं यह गलियाँ |

सुबह के उजाले के साथ रात की तरह वो  भी वापस लौट गया ,
पैसो  की दुनिया में उसने पैसो से ही  सच्चा प्यार पाया |
फर्क हम में और उनमे कैसे हो सकता है इतना ,
इंसानों के शरीर में समाया है खुदा का काया  |

ज़ख्मों को पट्टी करती यह गलियाँ ,
हर दुःख हर शरीर को आँचल से ढक देती यह गलियाँ , 
घिनौनी मगर इंसान को खिलौना नही समझती यह बदनाम गलियाँ |