Wednesday, 10 August 2011

 
अवांछित वृत्तांत...

सुलगती है मेरी वेदना ,
आ जाती है जो याद कभी ,
उस  धोखेबाज़ की |
गालियों और उपहति का बदला ,
मेरे ध्येय ने निस्तब्धता और संयम से  लिया |
घोर अनर्थ होता ,
मेरा उस दुर्जन शैतान दुष्ट से लड़ना |
जिसे कभी मित्र समझने की भूल कर डाली थी ,
अफ़सोस तले उस "खुद" को ,
कोसती अंतकरण मेरी |
ऐतबार जो कर लिया था ,
उसकी हर-एक कही बात का ,
बनावटी लगता है अब हर ज़र्रा उसका |
अहानिकर मै कर बैठती हूँ भरोसा ,
न जाने कैसे अजनबियों पर ,
दयालुता का पर्दा ओढ़े शैतान घुमते है यहाँ |
मैत्री का निरर्थक रूप ,
शायद सबों के दिल में जगह 
बनाकर बैठ गया है |
मेरा सिर्फ एक सवाल ......
दोस्ती अब इस जग के लिए क्या है ?
ढोंग, बेईमानी , नफरत या एक सम्बन्ध रिश्तेदारी |
जान कर उसकी सच्चाई ,
ठेस बहुत पहुंचा था मन को ,
लेकिन सच्चे साथियों ने थाम लिया इस जीवन को |
जो न होता कभी यह,
विक्रय मन को ,
न कभी जान पाती मै उस धोखेबाज़ के सच को |
बोझ बनाकर उसकी वृत्तान्त को ,
नही दुःख में रहना मुझे ,
जियूं हर पल हंसी - ख़ुशी चाहे ये दिया जब भी बुझे|
अशिष्ट अभिनय की ही उम्मीद ,
है मुझे उससे ,
परन्तु समंजनीय है मेरा आचरण इस दुविधा के लिए |
नित्य रहेगा वो धोखेबाज़ और उसकी हरकतें ,
नही उदित होंगी मेरे मन में कभी भी नफरतें ,
ज्ञात है उसकी  भड्कैल क्षमा की कोशिशें |
उतार कर फ़ेंक दिया है ,
किसी हेमंत की रात में ओढ़ी  हुई शॉल ,
जिसका कोई आडम्बर नही होता ग्रीष्म में की ही तरह ,
उस धोखेबाज़ की ,
"अवांछित वृत्तान्त " को |

- आशना सिन्हा